भक्ति आंदोलन क्या है bhakti aandolan

Contents hide
1) भक्ति आंदोलन का अखिल भारतीय स्वरूप

भक्ति आंदोलन का अखिल भारतीय स्वरूप

भक्ति आंदोलन पर निबंध

मध्‍यकालीन भारत के सांस्‍कृतिक इतिहास में भक्ति आन्दोलनों की एक खास भूमिका है। सामाजिक-धार्मिक सुधारकों ने इस काल में समाज विभिन्न तरह से भगवान की भक्ति का प्रचार-प्रसार किया। नारद, अलवर, नयनार, आदि शंकराचार्य, कुछ प्रमुख संत थे ।

bhakti andolan in india

मध्‍यकालीन भारत में भक्ति आंदोलन की शुरुआत सर्वप्रथम दक्षिण के अलवार तथा नयनार संतों द्वारा की गई। बारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में रामानंद द्वारा यह आंदोलन दक्षिण भारत से उत्तर भारत में लाया गया। इस आंदोलन कुछ प्रमुख संत चैतन्‍य महाप्रभु, नामदेव, तुकाराम, जयदेव ने और अधिक गति प्रदान की।

भक्ति आंदोलन का उद्देश्य –

हिन्दू धर्म एवं समाज में सुधार तथा इस्लाम एवं हिन्दू धर्म में समन्वय स्थापित करना। अपने सामाजिक-धार्मिक सुधारकों ने इस काल में समाज विभिन्न तरह से भगवान की भक्ति का प्रचार-प्रसार किया यह आंदोलन काफी हद तक सफल रहा। हिन्दुओं ने सूफ़ियों की तरह एकेश्वरवाद में विश्वास करते हुए ऊँच-नीच एवं जात-पात का विरोध किया।

भक्ति आंदोलन के प्रवर्तक

भक्ति आन्दोलन में संत शंकराचार्य  की भूमिका

भक्ति आंदोलन के प्रथम प्रचारक और संत शंकराचार्य थे। केरल में आठवीं शताब्दी में जन्मे संत शंकराचार्य द्वारा भारत में व्यापक स्तर पर भक्ति मत को ज्ञानवादी रूप में प्रसारित किया गया। शंकराचार्य के दर्शन का आधार वेदांत अथवा उपनिषद था। उनका सिद्धांत ‘अद्वैतवाद’ कहलाया।
शंकराचार्य ने भारत में धर्म की एकता के लिए भारत के चार भागों में चार मठ स्थापित किये-

  • वेदांत मठ, श्रृंगेरी (दक्षिण भारत)
  • गोवर्धन मठ, जगन्नाथपुरी (पूर्वी भारत)
  • शारदा मठ, द्वारका (पश्चिम भारत)
  • ज्योतिर्मठ, बद्रीकाश्रम (उत्तर भारत)

भक्ति आंदोलन NCERT

दार्शनिक संतों में सबसे अधिक प्रसिद्धि शंकराचार्य को मिली, परंतु शंकराचार्य का निर्गुण ज्ञानवादी दर्शन मन में उत्पन्न निराशा के विषाद को खत्म न कर सका और न ही सामान्य लोगों  को सुग्राह्य हो सका। परिणामतः कालांतर में संतों द्वारा अद्वैतवाद की आलोचना की गई तथा वैष्णव संतों द्वारा शंकर के अद्वैतवाद के विरोध में दक्षिण में मतों की स्थापना की गई, जो इस प्रकार है-

भक्ति आंदोलन bhakti aandolan
भक्ति आंदोलन bhakti aandolan
  1. विशिष्टाद्वैतवाद – रामानुजाचार्य
  2. द्वैतवाद – मध्वाचार्य
  3. शुद्धाद्वैतवाद -विष्णुस्वामी या वल्लभाचार्य
  4. द्वैताद्वैतवाद -निंबार्काचार्य
  5. भक्ति आन्दोलन का आरम्भ दक्षिण भारत में आलवारों एवं नायनारों से हुआ जो कालान्तर में उत्तर भारत सहित सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में फैल गया ।

इस हिन्‍दू क्रांतिकारी अभियान के नेता शंकराचार्य थे जो एक महान विचारक और जाने-माने दार्शनिक रहे । इस अभियान को चैतन्‍य महाप्रभु, नामदेव, तुकाराम, जयदेव ने और अधिक गति प्रदान की । इस अभियान की प्रमुख उपलब्धि मूर्ति पूजा को समाप्‍त करना रहा ।

शैव संत अप्पार ने पल्लव राजा महेन्द्रवर्मन को शैवधर्म स्वीकार करवाया ।

भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत

भक्ति कवि संतो के दो समूह थे-पहला वो जोमहाराष्ट्र में लोकप्रिय हुए और भगवान विठोबा के भक्त थे, ये तीर्थयात्रा-पंथ कहलाते थे । दूसरा समूह था-राजस्थान औरपंजाब का जिनकी निर्गुण भक्ति में आस्था थी ।

भक्ति आंदोलन के नेता रामानंद ने राम को भगवान के रूप में लेकर इसे केन्द्रित किया । उनके बारे में बहुत कम जानकारी है, परन्‍तु ऐसा माना जाता है कि वे 15वीं शताब्‍दी के प्रथमार्ध में रहे । उन्‍होंने सिखाया कि भगवान राम सर्वोच्‍च भगवान हैं और केवल उनके प्रति प्रेम और समर्पण के माध्‍यम से और उनके पवित्र नाम को बार – बार उच्‍चारित करने से ही मुक्ति पाई जाती है ।

भक्ति आन्दोलन में श्री रामनुजाचार्य की भूमिका

श्री रामनुजाचार्य भारतीय दर्शनशास्‍त्री थे और उन्‍हें सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण वैष्‍णव संत के रूप में मान्‍यता दी गई है । रामानंद ने उत्तर भारत में जो किया वही रामानुज ने दक्षिण भारत में किया । उन्‍होंने रुढिवादी कुविचार की बढ़ती औपचारिकता के विरुद्ध आवाज उठाई और प्रेम और समर्पण की नींव पर आधारित वैष्‍णव विचाराधारा के नए सम्‍प्रदायक की स्‍थापना की ।

शंकराचार्य के ‘अद्वैतदर्शन’ के विरोध में दक्षिण में वैष्णव संतों द्वारा 4 मतों की स्थापना की गई, जो निम्नलिखित हैं-

  • ‘विशिष्टाद्वैतवाद’ की स्थापना 12वीं सदी में रामानुजाचार्य ने की।
  • ‘द्वैतवाद’ की स्थापना 13वीं शताब्दी में मध्वाचार्य ने की।
  • ‘शुद्धाद्वैतवाद’ की स्थापना 13वीं सदी में विष्णुस्वामी ने की।
  • ‘द्वैताद्वैवाद’ की स्थापना 13वीं सदी में निम्बार्काचार्य ने की।

उनका सर्वाधिक असाधारण योगदान अपने मानने वालों के बीच जाति के भेदभाव को समाप्‍  करना।

भक्ति आन्दोलन में रामानंद वैष्णवाचार्य की भूमिका

स्वामी रामानंद का जन्म 1299 ई॰ में प्रयाग में हुआ था । इनके विचारों पर गुरु राघवानंद के विशिष्टा द्वैत मत का अधिक प्रभाव पड़ा । अपने मत के प्रचार के लिए इन्होंने भारत के विभिन्न तीर्थों की यात्रा कीं ।

तीर्थाटन से लौटने पर अनेक गुरु-भाइयों ने यह कहकर रामानंद के साथ भोजन करने से इंकार कर दिया कि इन्होंने तीर्थाटन में छुआछूत का विचार, नहीं किया होगा । इस पर रामानंद ने अपने शिष्यों को नया संप्रदाय चलाने की सलाह दी । कबीर, पीपा, रैदास आदि परम ‘विरागी’ महापुरुष आचार्य के शिष्य थे ।

भक्ति आन्दोलन में कबीर की भूमिका

इनका जन्म 1398 ई में हुआ। कबीर पन्थियों की मान्यता है कि कबीर का जन्म काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुआ । कुछ लोगों का कहना है कि वे जन्म से मुसलमान थे और युवावस्था में स्वामी रामानंद के प्रभाव से उन्हें हिन्दू धर्म की बातें मालूम हुईं । कबीर सन्त कवि और समाज सुधारक थे।

ये सिकन्दर लोदी के ये सुल्तान सिकन्दर शाह लोदी के समकालीन थे। सूरत गोपाल इनका मुख्य शिष्य था। मध्यकालीन संतों में कबीरदास का साहित्यिक एवं ऐतिहासिक योगदान निःसन्देह अविस्मरणीय है। कबीर का अर्थ अरबी भाषा में महान होता है । कबीरदास भारत के भक्ति काव्य परंपरा के महानतम कवियों में से एक थे।

भारत में धर्म, भाषा या संस्कृति किसी की भी चर्चा बिना कबीर की चर्चा के अधूरी ही रहेगी । कबीरपंथी, एक धार्मिक समुदाय जो कबीर के सिद्धांतों और शिक्षाओं को अपने जीवन शैली का आधार मानते हैं ।

भक्ति आन्दोलन में गुरू नानक की भूमिका

गुरू नानक का जन्म रावी नदी के किनारे स्थित तिलौंडा तलवंडी नामक गांव में 1469 ई में हुआ, जो अब ननकाना नाम से प्रसिद्ध है। इनके पिता का नाम कल्यानचंद या मेहता कालू जी था, माता का नाम तृप्ता देवी था। इनकी बहन का नाम नानकी था। इनका विवाह सोलह वर्ष की अवस्था में गुरदासपुर जिले के अंतर्गत लाखौकी नामक स्थान के रहनेवाले मूला की कन्या सुलक्षणी से हुआ था।

इन्होंने देश का चार बार चक्कर लगाया। 32 वर्ष की अवस्था में इनके प्रथम पुत्र श्रीचंद का जन्म हुआ। उन्होंने देश का पांच बार चक्कर लगाया। जिसे उदासीस कहा जाता है, इन्होंने कीर्तन के माथ्यम से उपदेश दिए। उन्होंने पूरे देश की यात्रा की। लोगों पर उनके विचारों का असाधारण प्रभाव पड़ा। उनमें सभी गुण मौजूद थे।

पैगंबर, दार्शनिक, राजयोगी, गृहस्थ, त्यागी, धर्मसुधारक, कवि, संगीतज्ञ, देशभक्त, विश्वबंधु आदि सभी गुण जैसे एक व्यक्ति में सिमटकर आ गए थे। अपने जीवन के अंतिम क्षणों में इन्होंने रावी नदी के किनारे अपना मठ बनाया। ये व्यक्तित्व असाधारण था। उनमें पैगम्बर, दार्शनिक, राजयोगी, गृहस्थ, त्यागी, धर्मसुधारक, समाज-सुधारक, कवि, संगीतज्ञ, देशभक्त, विश्वबन्धु सभी के गुण उत्कृष्ट मात्रा में विद्यमान थे।

उनमें विचार-शक्ति और क्रिया-शक्ति का अपूर्व सामंजस्य था। उनकी रचना ‘जपुजी’ का सिक्खों के लिए वही महत्त्व है जो हिंदुओं के लिए गीता का है। आध्यात्मिक आधार पर इन्होंने अपने बेटे के जगह अपने भाई लहना को अपना उत्तराधिकारी बनाया। 1539 ई में इनकी मृत्यु करतारपुर में हो गई। नानक ने सिक्ख धर्म की स्थापना की, नानक सूफी धर्म बाबा फरीद से प्रभावित थे।

भक्ति आन्दोलन

भक्ति आन्दोलन में चैतन्य महाप्रभु की भूमिका

चैतन्य महाप्रभु का जन्म सन् 1486 ई में पश्चिम बंगाल के नादिया में हुआ। इनके पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र और मां का नाम शचि देवी था। पाठशाला में चैतन्य का नाम निमाई पंडित था। चैतन्य महाप्रभु द्वारा गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की स्थापना की गई और वृंदावन को अपनी कर्मभूमि बनाया गया। इन्होंने केशव भारती नामक संन्यासी से दीक्षा ली थी।

चैतन्‍य महाप्रमु

एक पवित्र हिन्‍दू भिक्षु और सामाजिक सुधार थे तथा वे सोलहवीं शताब्‍दी के दौरान बंगाल में हुए। भगवान के प्रति प्रेम भाव रखने के प्रबल समर्थक, भक्ति योग के प्रवर्तक, चैतन्‍य ने ईश्‍वर की आराधना श्रीकृष्‍ण के रूप में की। कुछ लोग माधवेन्द्र पुरी को इनका दीक्षा गुरु मानते हैं। इनकी पत्नी का नाम लक्ष्मीप्रिया और विष्णुप्रिया था। उनका देहांत उड़ीसा के पुरी तीर्थस्थल पर हुआ।

भक्ति आन्दोलन में मद्ववल्लभाचार्य की भूमिका

श्री मद्वल्लभाचार्य का जन्म 1479 ई में चंपारण्य में हुआ था। इनके पिता का नाम लक्ष्मण भट्ट और माता का नाम यल्लमगरू था। इनका विवाह महालक्ष्मी के साथ हुआ। इनके दो बेटे थे-गोपीनाथ और विठ्ठलनाथ। इन्होंने अरैल में अपना निवास स्थान बनाया। इन्होंने भक्ति साधना पर जोर दिया और मोक्ष के लिए भक्ति को साधन बताया।

इनके भक्तिमार्ग को पुष्टिमार्ग कहते है। गोस्वामी तुलसीदास-एक महान कवि थे। उनका जन्म यूपी के बांदा में हुआ था। अपने जीवनकाल में उन्होंने 12 ग्रन्थ लिखे। उन्हें संस्कृत विद्वान होने के साथ ही हिन्दी भाषा के प्रसिद्ध और सर्वश्रेष्ठ कवियों में एक माना जाता है।

उनको मूल आदि काव्य रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि का अवतार भी माना जाता है। इन्होंने श्रीरामचरितमानस की रचना की थी।

भक्ति आन्दोलन में धन्ना की भूमिका

धन्ना का जन्म 1415 ई में एक जाट परिवार में हुआ, राजपुताना से आकर ये बनारस में रामानंद के शिष्य बन गए। कहा जाता है कि इन्होंने भगवान की मूर्ति को भोजन करवाया था

भक्ति आन्दोलन में दादूदयाल की भूमिका

हिन्दी के भक्तिकाल में ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रमुख सन्त कवि थे। दादू दयाल जन्म 1544 ई में अहमदाबाद में हुआ था। इनका संबंध धुनिया जाति से है। गृहस्थी त्यागकर इन्होंने 12 वर्षों तक कठिन तप किया।

दादू ने फ़तेहपुर सीकरी में अकबर से भेंट की थी और चालीस दिनों तक आध्यात्मिक विषयों की चर्चा भी करते रहे थे।इन्होंने निपख नामक आंदोलन की शुरूआत की। इन्होंने शबद और साखी लिखीं। इनकी रचना प्रेमभावपूर्ण है। इनके अधिकतर पद जात-पात के निराकरण, हिन्दू-मुसलमानों की एकता आदि विषयों पर हैं।

भक्ति आंदोलन और रविदास

संत रैदास जाति के चमार थे। लेकिन इनका धार्मिक जीवन जितना गूढ़ था, उतना ही उन्नत और पवित्र था। ये रामानंद के 12 शिष्यों में से एक थे।ये रामानन्द के अति प्रसिद्ध शिष्यों में से थे। ये जूता बनाकर जीविकोपार्जन करते थे। कबीर के समसामयिक कहे जाते हैं। मध्ययुगीन संतों में रैदास का महत्त्वपूर्ण स्थान है। मीराबाई ने इन्हें अपना गुरू माना है। इन्होंने रायदासी संप्रदाय की स्थापना की।

भक्ति आन्दोलन में निष्कर्षतः

भक्ति आंदोलन से हिन्दू-मुस्लिम सभ्यताओं का संपर्क हुआ और दोनों के दृष्टिकोण में परिवर्तन आया। भक्तिमार्गी संतों ने समता का प्रचार किया और सभी धर्मों के लोगों की आध्यात्मिक और नैतिक उन्नति के लिये प्रयास किये।

भक्ति आंदोलन के महत्वपूर्ण प्रश्न

भक्ति आंदोलन quiz bpsc ke liye bahut hi helpful sabit ho skta ha.

 

 

 

you’ll have 15 second to answer each question for भक्ति आंदोलन.

Time’s Up

score:

भक्ति आंदोलन

Total Questions:

भक्ति आंदोलन Attempt:

Correct:

Wrong:

Percentage:


 

Leave a Comment