भक्ति आंदोलन क्या है bhakti aandolan

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1) भक्ति आंदोलन का अखिल भारतीय स्वरूप

भक्ति आंदोलन का अखिल भारतीय स्वरूप

भक्ति आंदोलन पर निबंध

मध्‍यकालीन भारत के सांस्‍कृतिक इतिहास में भक्ति आन्दोलनों की एक खास भूमिका है। सामाजिक-धार्मिक सुधारकों ने इस काल में समाज विभिन्न तरह से भगवान की भक्ति का प्रचार-प्रसार किया। नारद, अलवर, नयनार, आदि शंकराचार्य, कुछ प्रमुख संत थे ।

भक्ति आंदोलन का पृष्ठभूमि

भक्ति आंदोलन भारतीय सांस्कृतिक इतिहास की एक अनोखी घटना है , जो वैश्विक इतिहास में दुर्लभ है । यह भक्ति आंदोलन ही था , जिसने भारतीयों को भावात्मक एवं राष्ट्रीय एकता के सूत्र में बाँधा । तुलसीदास भारत के श्रेश्ठ भक्त कवि हैं क्योंकि तुलसी ने भक्ति के आधार पर जन – साधारण के लिए धर्म को सरल और सुलभ बनाकर पुरोहितों के धार्मिक अधिकार की जड़ें हिला दीं । तुलसी मानवीय करुणा के कवि हैं जिन्होंने कोल , किरात , आभीर , जवन , खस , श्वपच आदि सभी अन्त्यजों और अछूतों को भक्ति का उत्तराधिकारी माना । तुलसी का साहित्य निष्क्रियता का साहित्य नहीं है , और यह जीवन की अस्वीकृति का साहित्य भी नहीं है ।

भक्ति आंदोलन के प्रणेता कौन थे?

भारत के नए जागरण का कोई महान् कवि भक्ति आंदोलन और तुलसीदास से पराङ्मुख होकर नहीं रह सकता । कवि द्वारा गोस्वामी तुलसीदास की प्रशंसा और स्वीकार्यता तुलसी के लोकनायक , कालजयी और शाश्वत कवि होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है । मूल पाठ तुलसीदास भारत के श्रेष्ठ भक्त कवि . भक्ति – आंदोलन के निर्माता , उसी भक्ति – आदोलन की महान् उपलब्धि हैं ।

भक्ति आंदोलन की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए

उनके साहित्य का सामाजिक महत्व भक्ति – आंदोलन के सामाजिक महत्त्व पर निर्भर है , उससे पूरी तरह संबद्ध है । भक्ति – आंदोलन अखिल भारतीय है । देश और काल की दृष्टि से ऐसा व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन संसार में दूसरा नहीं है । ईसा की दूसरी शताब्दी में ही आंध्रप्रदेश में कृष्णोपासना के चिहन पाएभक्ति – आंदोलन अखिल भारतीय है । देश और काल की दृष्टि से ऐसा व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन संसार में दूसरा नहीं है । ईसा की दूसरी शताब्दी में ही आंधप्रदेश में कृष्णोपासना के चिह्न पाए जाते हैं । गुप्त सम्राटों के युग में विष्णुनारायण – वासुदेव की उपासना ने अखिल भारतीय रूप ले लिया ।

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भक्ति आंदोलन की शुरुआत कब हुई?

पाँचवीं शताब्दी से लेकर नवीं शताब्दी तक तमिलनाडु भक्ति – आंदोलन का प्रमुख स्रोत रहा । आलवार संतों की कीर्ति सारे भारत में फैल गई । कश्मीर में लल देव , तमिलनाडु में आंदाल , बंगाल में चंडीदास , गुजरात में नरसी मेहता- भारत के विभिन्न प्रदेशों में भक्त कवि लगभग डेढ़ हजार वर्ष तक जनता के हदय को अपनी अमृतवाणी से सींचते रहे ।

भक्ति आंदोलन के उद्देश्य क्या थे?

यह भक्ति – आंदोलन ब्रह्मदेश , अफगानिस्तान और ईरान की सीमाओं पर जाकर रुक जाता है ; सिन्ध कश्मीर , पंजाब , बंगाल , महाराष्ट्र , आंध्र , तमिलनाडु आदि प्रदेशों पर भक्ति – आंदोलन की धारा पूरे वेग से बहती है । भक्त – कवियों ने विभिन्न प्रदेशों को राष्ट्रीय एकता के सूत्र में बाँधने में कितना बड़ा काम किया , उसका मूल्य आँकना सहज नहीं है ।

भक्ति आंदोलन का समाज पर प्रभाव

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उनके पास राजनीतिशास्त्र के कोई ऐसे परिचित सूत्र नहीं थे , जिन्हें वे आये दिन दोहराते हुए जनता को एकताबद्ध करते । उन्होंने भावात्मक रूप से जनता को एक किया । इस भावात्मक एकता में मुख्य भाव था भक्ति का । उस समय दैनिक – समाचार पत्र नहीं थे , साप्ताहिक और मासिक पत्र नहीं थे । प्रचार की सुविधाओं के लिए रेडियो नहीं था । आज ये सब साधन सुलभ है । किंतु क्या आज भारतीय जनता में – विशेष रूप से जनता के नेताओं में , उनकी पार्टियों में – वह भावात्मक एकता है , जो तुलसी के युग में थी ? यह प्रश्न करने से ही भक्ति – आंदोलन के राष्ट्रीय महत्त्व का ज्ञान हो जाएगा ।

सम्भवतः तुलसीदास के युग में विभिन्न प्रदेशों के साहित्यकार एक – दूसरे की विचारधाराओं से जितना परिचित थे , उतना आज नहीं है । इचर विभिन्न भाषाओं के साहित्यिक आंदोलनों को लेकर अनेक शोच ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं । इनसे यह स्पश्ट होता जा रहा है कि हिंदी तथा अन्य भाताओं के भक्ति साहित्य में जो समानताएँ दिखायी देती हैं , वे आकस्मिक नहीं हैं । ये इतर प्रदेशों के साहित्य से परिचित होने का फल है । भक्ति – आदोलन से जो भावात्मक एकता स्थापित हुई , उसमें जितना फैलाव था , उतनी गहराई भी थी ।

भक्ति आंदोलन की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए और समाज पर इसके प्रभाव की विवेचना कीजिए

यह एकता समाज के थोडे से शिक्षितजनों तक सीमित नहीं थी । संस्कृत के द्वारा जो राष्ट्रीय एकता कायम हुई थी , उससे यह भिन्न थी । यह एकता प्रादेशिक भाषाओं के माध्यम से कायम हो रही थी । भक्ति आंदोलन एक और अखिल भारतीय आंदोलन था , दूसरी ओर वह प्रदेशगत , जातीय आंदोलन भी था । देश और प्रदेश एक साथ , राष्ट्र और जाति दोनों की सांस्कृतिक धाराएं एक साथ । भक्ति – आदोलन की व्यापकता और सामर्थ्य का यही रहस्य है । जो लोग समझते हैं कि अंग्रेजों के आने से पहले यहाँ राष्ट्रीय एकता का अभाव था , उन्हें भक्ति आंदोलन के इस अखिल भारतीय स्वरूप पर विचार करना चाहिए ।

भलि भारत भूमि भले कुल जन्म , समाज सरीर भलो लहि के । जो भजे भगवान सयान सोई तुलसी हठ चातक ज्यो गहि के ।। यह उक्ति तुलसीदास की है । अनेक विदवान मानते है कि राश्ट्रीय एकता का ही नहीं जनतंत्र का पाठ भी अंग्रेजों ने ही हमें पढ़ाया । अंग्रेज न आते तो यहाँ के लोग संकीर्ण जातिवाद में फंसे रहते । इन विदवानों को विचार करना चाहिए कि भक्ति आदोलन में इतने जुलाहे , दर्जी नाई आदि इतर वर्गों के लोग कैसे सिमट आए ?

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आज कल विश्वविद्यालयों में और साहित्य में कितने अध्यापक और लेखक है जो द्विजेतर वर्गों के हैं । संभवतः जातिप्रथा जितनी दृढ़ आज है , उतनी नामदेव दर्जी , सेना नाई , चोखा महार , रैदास और कबीर जुलाहे के समय में न थी । और जातिवाद संकीर्णता जितनी शिक्षितजनों में है , सम्भवतः उतनी सूर और कबीर के पद गाने – वाले अपद जनों में नहीं है । वर्णाश्रम धर्म और जातिप्रथा की जितनी तीव्र आलोचना भक्ति – साहित्य में है . उतनी आधुनिक साहित्य में नहीं है । यहाँ पर आपत्ति की जा सकती है कि मैं भक्ति – आंदोलन को बहुत व्यापक अर्थ दे रहा हूँ ।

सूफी कौन थे

भक्त और संत अलग थे , इन दोनों से भिन्न प्रेममार्गी कवि थे । इन सबको एक आदोलन में शामिल करना अनुचित इसका उत्तर यह है कि स्वयं भक्त और संत कवि भक्तों और संतों में वैसा भेद न करते थे जैसा आलोचक करते हैं । संत समा चहुँ दिसि अंबराई । श्रद्धा स्तुि वसन्त सम आई । सन्तसभा अनुपम अवध , सकल सुमंगल मूल । बन्दउ सन्त समान चित , हित अनहित नहिं कोई । तुलसीदास की इन उक्तियों से देखा जा सकता है कि सन्त और भक्त शब्द उनके लिए पर्यायवाची है । उधर कबीर की उक्ति है ।

सहजै सहजै मेला होयगा , जागी भक्ति उतगा ।

कहै कबीर सुनो हो गोरख चलौ गीत के रागा ।।

कबीर

कबीर भी सन्त और भक्त में भेद नहीं करते । मलिक मुहम्मद जायसी वेद – पुराण और कुरान सभी का आदर करते थे । वेद – पन्य जे नहि चलहि , ते भूलहिं बन मोड । यह उचित जायसी की है । पुराणों के बारे में लिखा था . एहि यिघि चीन्हहु करहु गियान् । जस पुरान मह लिखा क्यानू । प्रेम – ज्ञान – वैराग्य निर्गुण – सगुण आदि के भेदभाय उस समय अवश्य थे किन्तु ये सब एक व्यापक आंदोलन के अन्तर्गत थे । ये भेद जतने महत्त्वपूर्ण म थे . जितने कुछ आलोचकों को आज वे लगते हैं ।

निर्गुण भक्ति के कवि

निराला जी ने अपने अनेक नियों में प्रतिपादित किया कि गोरखामी तुलसीदास मूलतः रहस्यवादी थे । उनकी इस स्थापना के पीछे यहाबोध था कि कबीर , जायसी सूर और तुलसी की चेतना का एक सामान्य स्तर है । यह रहस्यवादा का सामाजिक महत्व असाधारण है । यह रहस्यवाद अद्वैत बहा के साक्षात्कार का दावा करके अनेक धर्मों और मतों के परस्पर विद्वेश का खण्डन करता था ।

वह उच्य वर्गों के कर्मकाण्डी धमाको स्थान पर लोकधर्म की स्थापना करता था । इस लोकधर्म का आधार था प्रेम कबीर , तुलसी , जायसी आदि कवि रहलावादियों को सामान ज्ञान – नेत्र खुलने आनन्द से विहपल होने की बाते करते है और इस आनन्दाको भाव – प्रेम से जोर देते थे । जायसी ने लिखा था ।

सैयद जसरफ पीर पियाय ।

जेहि मोहिं पन्य दीन उजियारा ।

नसा हिय प्रेम कर दिया ।

उढी जोतिभा निरमल हिया ।।

जायसी शान – नेत्र खुले उन्हें जो प्रकाश दिखायी दिया , यह प्रेम का प्रकाश था ।

यहाँ भी ज्ञान – नेत्र खुलने की बात है । जो प्रकाश दिखायी देता है , उसमें प्रेम प्रवाह ही उमगता है । यही प्रेम की भावात्मक एकता कबीर , सूर , जायसी और तुलसी को एक सामान्य भावभूमि पर ला खड़ा करती है । तुलसी के उपास्य देव को कर्मकाण्ड नहीं , प्रेम ही प्रिय है . रामहि केवल प्रेम पियारा । जानि लेउ जो जाननिहारा ।। यही प्रेम तत्व मानव – समाज को एक सूत्र में बाँधने वाला है । आधुनिक काल में जड़ और चेतन , सगुण और निर्गुण , ज्ञान और भक्ति का भेद आलोचकों के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हो गया है ।

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भक्ति आंदोलन अखिल भारतीय सांस्कृतिक आंदोलन

तुलसी के युग में भी इस तरह के भेद थे , किंतु तुलसीदास तथा अन्य कवियों का प्रयत्न इन भेदों को दूर करने की ओर था , उन्हें दृढ़ करने के लिए नहीं । निर्गुण और सगुण परस्पर विरोधी नहीं है । एक ही सत्ता , व्यक्त और अव्यक्त , दोनों है । तुलसी की एक सामान्य दार्शनिक भूमि है , उसी के अनुरूप उनके साहित्य की सामाजिक विषयवस्तु में बहुत बडी समानता है । भक्ति – आंदोलन अखिल भारतीय सांस्कृतिक आंदोलन था । इस आंदोलन की श्रेश्ठ देन थे , तुलसीदास । उन्होंने निर्गुण – पधियों और सगुण – मतावलम्बियों को एक किया . उन्होंने वैश्णवों और शाक्तों को मिलाया ।

उन्होंने भक्ति के आधार पर जनसाधारण के लिए धर्म को सरल और सुलभ बनाकर पुरोहितों के धार्मिक अधिकार की जड़ें हिला दीं । तुलसीदास मानवीय करुणा के अन्यतम कवि हैं । उनके राम दीनबन्धु है । सबरी गीध सुसेवकनि सुगति कीन्ह रघुनाथ । वनवासी कोलकिरात राम के दर्शन से प्रसन्न होते हैं । आभीर जवन किरात खस श्वपचादि सभी राम के स्मरण से मोक्ष – लाम करते हैं । गोस्वामी तुलसीदास ने राम को उपास्य मानकर आस्था का भवन निर्मित किया था । किन्तु कष्ट सहते – सहते एक बार तुलसीदास की आस्था भी डिग गयी थी । इससे उनके मर्मान्तक कष्ट की कल्पना की जा सकती है । भक्ति – साहित्य निराशाजन्य साहित्य नहीं है , यद्यपि उसमें निराशा भी है । यह स्थापना कि मुसलमानों के शासनकाल में पराधीनता के कारण लोग भक्ति और निराशा के गीत गाने लगे , अवैज्ञानिक है । भक्ति – आंदोलन तुर्क आक्रमणों से पहले का है । गुप्त समाटों के युग में ही वैष्णव मत का प्रसार होता है ।

भक्ति आंदोलन की शुरुआत

तमिलनाडु भक्ति – आंदोलन का केन्द्र रहा , जहाँ मुसलमानों का शासन न था । स्वयं अनेक मुस्लिम संतों ने इस आंदोलन में योग दिया । भक्ति – आंदोलन विशुद्ध देशज आंदोलन है । वह सामन्ती समाज की परिस्थितियों से उत्पन्न हुआ था , वह मूलतः इस सामन्ती समाज – व्यवस्था से विद्रोह का साहित्य है । तुलसी – साहित्य एक ओर आत्मनिवेदन और विनय का साहित्य है , दूसरी ओर वह प्रतिरोध का साहित्य भी है ।

भक्ति आंदोलन का समाज पर प्रभाव

हमारे समाज पर गोस्वामी तुलसीदास का इतना गहरा प्रभाव है कि आज यह कल्पना करना कठिन है कि तुलसीदास ने अनेक प्रचलित मान्यताएँ अस्वीकार करके यह साहित्य रचा था । वे राम के सम्मुख ही विनम्र और करुण स्वर में बोलने वाले कवि हैं , औरों के आगे सर हमेशा ऊँचा रखते थे । वे आत्मत्याग करने वाले को सर्वश्रेश्ठ व्यक्ति मानते हैं । भक्त के पास अपना कुछ नहीं होता , इसलिए – ‘ राम ते अधिक राम कर दासा । ‘ सामन्ती समाज के साहित्य की सबसे बड़ी कमजोरी होती है – निष्क्रियता ।

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तुलसी का साहित्य निष्क्रियता का साहित्य नहीं है । धनुर्धर राम रावण का वध करने वाले पुरुषोत्तम है । तुलसी का साहित्य जीवन की अस्वीकृति का साहित्य नहीं है । वे उन लोगों का मजाक उड़ाते हैं जो काम , क्रोध के भय के मारे रात को सो नहीं पाते -‘जाग जोगी जगम जती जमाती ध्यान धरै उर भारी लोग मोह कोह काम के । केवल राम का भक्त चैन से सोता है -‘सोवै सुख तुलसी भरोसे एक राम के । ‘ काम , क्रोध , मदं लोभ , बुरे हैं , किन्तु आवश्यक भी भेद है मर्यादा का । यूरुप के सन्तों की तरह तुलसी को स्वर्ग का मोह नहीं है , न उन्हें नरक का भय है । उनके राम अपनी जन्मभूमि को स्वर्ग से भी अधिक प्यार करते हैं ।

तुलसीदास ने जो राम में जो जन्मभूमि का प्रेम , निर्धन और परित्यक्त जनों के प्रति प्रेम चित्रित किया है , वह आकस्मिक नहीं है । स्वयं उनके हृदय में जो प्रेम – प्रमोद – प्रवाह उमगा था , वही राम में साकार हो गया है । उन्होंने कहा भी था – जाकी रही भावना जैसी । प्रभु मूरति देखी तिन तैसी । तुलसीदास ने भी अपनी भावना के अनुसार राम को प्रेममय , अपार करुणामय देखा है । रामचरितमानस ‘ के राम वाल्मीकि , कालिदास , भवभूति अन्य सभी कवियों के रामों से भिन्न हैं । वे तुलसी के राम हैं । उनमें हमें स्वय तुलसीदास की मानवीय छवि दिखायी देती है ।

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मध्‍यकालीन भारत में भक्ति आंदोलन की शुरुआत सर्वप्रथम दक्षिण के अलवार तथा नयनार संतों द्वारा की गई। बारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में रामानंद द्वारा यह आंदोलन दक्षिण भारत से उत्तर भारत में लाया गया। इस आंदोलन कुछ प्रमुख संत चैतन्‍य महाप्रभु, नामदेव, तुकाराम, जयदेव ने और अधिक गति प्रदान की।

भक्ति आंदोलन का उद्देश्य –

हिन्दू धर्म एवं समाज में सुधार तथा इस्लाम एवं हिन्दू धर्म में समन्वय स्थापित करना। अपने सामाजिक-धार्मिक सुधारकों ने इस काल में समाज विभिन्न तरह से भगवान की भक्ति का प्रचार-प्रसार किया यह आंदोलन काफी हद तक सफल रहा। हिन्दुओं ने सूफ़ियों की तरह एकेश्वरवाद में विश्वास करते हुए ऊँच-नीच एवं जात-पात का विरोध किया।

भक्ति आंदोलन के प्रवर्तक

भक्ति आन्दोलन में संत शंकराचार्य  की भूमिका

भक्ति आंदोलन के प्रथम प्रचारक और संत शंकराचार्य थे। केरल में आठवीं शताब्दी में जन्मे संत शंकराचार्य द्वारा भारत में व्यापक स्तर पर भक्ति मत को ज्ञानवादी रूप में प्रसारित किया गया। शंकराचार्य के दर्शन का आधार वेदांत अथवा उपनिषद था। उनका सिद्धांत ‘अद्वैतवाद’ कहलाया।
शंकराचार्य ने भारत में धर्म की एकता के लिए भारत के चार भागों में चार मठ स्थापित किये-

  • वेदांत मठ, श्रृंगेरी (दक्षिण भारत)
  • गोवर्धन मठ, जगन्नाथपुरी (पूर्वी भारत)
  • शारदा मठ, द्वारका (पश्चिम भारत)
  • ज्योतिर्मठ, बद्रीकाश्रम (उत्तर भारत)

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दार्शनिक संतों में सबसे अधिक प्रसिद्धि शंकराचार्य को मिली, परंतु शंकराचार्य का निर्गुण ज्ञानवादी दर्शन मन में उत्पन्न निराशा के विषाद को खत्म न कर सका और न ही सामान्य लोगों  को सुग्राह्य हो सका। परिणामतः कालांतर में संतों द्वारा अद्वैतवाद की आलोचना की गई तथा वैष्णव संतों द्वारा शंकर के अद्वैतवाद के विरोध में दक्षिण में मतों की स्थापना की गई, जो इस प्रकार है-

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  1. विशिष्टाद्वैतवाद – रामानुजाचार्य
  2. द्वैतवाद – मध्वाचार्य
  3. शुद्धाद्वैतवाद -विष्णुस्वामी या वल्लभाचार्य
  4. द्वैताद्वैतवाद -निंबार्काचार्य
  5. भक्ति आन्दोलन का आरम्भ दक्षिण भारत में आलवारों एवं नायनारों से हुआ जो कालान्तर में उत्तर भारत सहित सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में फैल गया ।

इस हिन्‍दू क्रांतिकारी अभियान के नेता शंकराचार्य थे जो एक महान विचारक और जाने-माने दार्शनिक रहे । इस अभियान को चैतन्‍य महाप्रभु, नामदेव, तुकाराम, जयदेव ने और अधिक गति प्रदान की । इस अभियान की प्रमुख उपलब्धि मूर्ति पूजा को समाप्‍त करना रहा ।

शैव संत अप्पार ने पल्लव राजा महेन्द्रवर्मन को शैवधर्म स्वीकार करवाया ।

भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत

भक्ति कवि संतो के दो समूह थे-पहला वो जोमहाराष्ट्र में लोकप्रिय हुए और भगवान विठोबा के भक्त थे, ये तीर्थयात्रा-पंथ कहलाते थे । दूसरा समूह था-राजस्थान औरपंजाब का जिनकी निर्गुण भक्ति में आस्था थी ।

भक्ति आंदोलन के नेता रामानंद ने राम को भगवान के रूप में लेकर इसे केन्द्रित किया । उनके बारे में बहुत कम जानकारी है, परन्‍तु ऐसा माना जाता है कि वे 15वीं शताब्‍दी के प्रथमार्ध में रहे । उन्‍होंने सिखाया कि भगवान राम सर्वोच्‍च भगवान हैं और केवल उनके प्रति प्रेम और समर्पण के माध्‍यम से और उनके पवित्र नाम को बार – बार उच्‍चारित करने से ही मुक्ति पाई जाती है ।

भक्ति आन्दोलन में श्री रामनुजाचार्य की भूमिका

श्री रामनुजाचार्य भारतीय दर्शनशास्‍त्री थे और उन्‍हें सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण वैष्‍णव संत के रूप में मान्‍यता दी गई है । रामानंद ने उत्तर भारत में जो किया वही रामानुज ने दक्षिण भारत में किया । उन्‍होंने रुढिवादी कुविचार की बढ़ती औपचारिकता के विरुद्ध आवाज उठाई और प्रेम और समर्पण की नींव पर आधारित वैष्‍णव विचाराधारा के नए सम्‍प्रदायक की स्‍थापना की ।

शंकराचार्य के ‘अद्वैतदर्शन’ के विरोध में दक्षिण में वैष्णव संतों द्वारा 4 मतों की स्थापना की गई, जो निम्नलिखित हैं-

  • ‘विशिष्टाद्वैतवाद’ की स्थापना 12वीं सदी में रामानुजाचार्य ने की।
  • ‘द्वैतवाद’ की स्थापना 13वीं शताब्दी में मध्वाचार्य ने की।
  • ‘शुद्धाद्वैतवाद’ की स्थापना 13वीं सदी में विष्णुस्वामी ने की।
  • ‘द्वैताद्वैवाद’ की स्थापना 13वीं सदी में निम्बार्काचार्य ने की।

उनका सर्वाधिक असाधारण योगदान अपने मानने वालों के बीच जाति के भेदभाव को समाप्‍  करना।

भक्ति आन्दोलन में रामानंद वैष्णवाचार्य की भूमिका

स्वामी रामानंद का जन्म 1299 ई॰ में प्रयाग में हुआ था । इनके विचारों पर गुरु राघवानंद के विशिष्टा द्वैत मत का अधिक प्रभाव पड़ा । अपने मत के प्रचार के लिए इन्होंने भारत के विभिन्न तीर्थों की यात्रा कीं ।

तीर्थाटन से लौटने पर अनेक गुरु-भाइयों ने यह कहकर रामानंद के साथ भोजन करने से इंकार कर दिया कि इन्होंने तीर्थाटन में छुआछूत का विचार, नहीं किया होगा । इस पर रामानंद ने अपने शिष्यों को नया संप्रदाय चलाने की सलाह दी । कबीर, पीपा, रैदास आदि परम ‘विरागी’ महापुरुष आचार्य के शिष्य थे ।

भक्ति आन्दोलन में कबीर की भूमिका

इनका जन्म 1398 ई में हुआ। कबीर पन्थियों की मान्यता है कि कबीर का जन्म काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुआ । कुछ लोगों का कहना है कि वे जन्म से मुसलमान थे और युवावस्था में स्वामी रामानंद के प्रभाव से उन्हें हिन्दू धर्म की बातें मालूम हुईं । कबीर सन्त कवि और समाज सुधारक थे।

ये सिकन्दर लोदी के ये सुल्तान सिकन्दर शाह लोदी के समकालीन थे। सूरत गोपाल इनका मुख्य शिष्य था। मध्यकालीन संतों में कबीरदास का साहित्यिक एवं ऐतिहासिक योगदान निःसन्देह अविस्मरणीय है। कबीर का अर्थ अरबी भाषा में महान होता है । कबीरदास भारत के भक्ति काव्य परंपरा के महानतम कवियों में से एक थे।

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भारत में धर्म, भाषा या संस्कृति किसी की भी चर्चा बिना कबीर की चर्चा के अधूरी ही रहेगी । कबीरपंथी, एक धार्मिक समुदाय जो कबीर के सिद्धांतों और शिक्षाओं को अपने जीवन शैली का आधार मानते हैं ।

भक्ति आन्दोलन में गुरू नानक की भूमिका

गुरू नानक का जन्म रावी नदी के किनारे स्थित तिलौंडा तलवंडी नामक गांव में 1469 ई में हुआ, जो अब ननकाना नाम से प्रसिद्ध है। इनके पिता का नाम कल्यानचंद या मेहता कालू जी था, माता का नाम तृप्ता देवी था। इनकी बहन का नाम नानकी था। इनका विवाह सोलह वर्ष की अवस्था में गुरदासपुर जिले के अंतर्गत लाखौकी नामक स्थान के रहनेवाले मूला की कन्या सुलक्षणी से हुआ था।

इन्होंने देश का चार बार चक्कर लगाया। 32 वर्ष की अवस्था में इनके प्रथम पुत्र श्रीचंद का जन्म हुआ। उन्होंने देश का पांच बार चक्कर लगाया। जिसे उदासीस कहा जाता है, इन्होंने कीर्तन के माथ्यम से उपदेश दिए। उन्होंने पूरे देश की यात्रा की। लोगों पर उनके विचारों का असाधारण प्रभाव पड़ा। उनमें सभी गुण मौजूद थे।

पैगंबर, दार्शनिक, राजयोगी, गृहस्थ, त्यागी, धर्मसुधारक, कवि, संगीतज्ञ, देशभक्त, विश्वबंधु आदि सभी गुण जैसे एक व्यक्ति में सिमटकर आ गए थे। अपने जीवन के अंतिम क्षणों में इन्होंने रावी नदी के किनारे अपना मठ बनाया। ये व्यक्तित्व असाधारण था। उनमें पैगम्बर, दार्शनिक, राजयोगी, गृहस्थ, त्यागी, धर्मसुधारक, समाज-सुधारक, कवि, संगीतज्ञ, देशभक्त, विश्वबन्धु सभी के गुण उत्कृष्ट मात्रा में विद्यमान थे।

उनमें विचार-शक्ति और क्रिया-शक्ति का अपूर्व सामंजस्य था। उनकी रचना ‘जपुजी’ का सिक्खों के लिए वही महत्त्व है जो हिंदुओं के लिए गीता का है। आध्यात्मिक आधार पर इन्होंने अपने बेटे के जगह अपने भाई लहना को अपना उत्तराधिकारी बनाया। 1539 ई में इनकी मृत्यु करतारपुर में हो गई। नानक ने सिक्ख धर्म की स्थापना की, नानक सूफी धर्म बाबा फरीद से प्रभावित थे।

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भक्ति आन्दोलन में चैतन्य महाप्रभु की भूमिका

चैतन्य महाप्रभु का जन्म सन् 1486 ई में पश्चिम बंगाल के नादिया में हुआ। इनके पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र और मां का नाम शचि देवी था। पाठशाला में चैतन्य का नाम निमाई पंडित था। चैतन्य महाप्रभु द्वारा गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की स्थापना की गई और वृंदावन को अपनी कर्मभूमि बनाया गया। इन्होंने केशव भारती नामक संन्यासी से दीक्षा ली थी।

चैतन्‍य महाप्रमु

एक पवित्र हिन्‍दू भिक्षु और सामाजिक सुधार थे तथा वे सोलहवीं शताब्‍दी के दौरान बंगाल में हुए। भगवान के प्रति प्रेम भाव रखने के प्रबल समर्थक, भक्ति योग के प्रवर्तक, चैतन्‍य ने ईश्‍वर की आराधना श्रीकृष्‍ण के रूप में की। कुछ लोग माधवेन्द्र पुरी को इनका दीक्षा गुरु मानते हैं। इनकी पत्नी का नाम लक्ष्मीप्रिया और विष्णुप्रिया था। उनका देहांत उड़ीसा के पुरी तीर्थस्थल पर हुआ।

भक्ति आन्दोलन में मद्ववल्लभाचार्य की भूमिका

श्री मद्वल्लभाचार्य का जन्म 1479 ई में चंपारण्य में हुआ था। इनके पिता का नाम लक्ष्मण भट्ट और माता का नाम यल्लमगरू था। इनका विवाह महालक्ष्मी के साथ हुआ। इनके दो बेटे थे-गोपीनाथ और विठ्ठलनाथ। इन्होंने अरैल में अपना निवास स्थान बनाया। इन्होंने भक्ति साधना पर जोर दिया और मोक्ष के लिए भक्ति को साधन बताया।

इनके भक्तिमार्ग को पुष्टिमार्ग कहते है। गोस्वामी तुलसीदास-एक महान कवि थे। उनका जन्म यूपी के बांदा में हुआ था। अपने जीवनकाल में उन्होंने 12 ग्रन्थ लिखे। उन्हें संस्कृत विद्वान होने के साथ ही हिन्दी भाषा के प्रसिद्ध और सर्वश्रेष्ठ कवियों में एक माना जाता है।

उनको मूल आदि काव्य रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि का अवतार भी माना जाता है। इन्होंने श्रीरामचरितमानस की रचना की थी।

भक्ति आन्दोलन में धन्ना की भूमिका

धन्ना का जन्म 1415 ई में एक जाट परिवार में हुआ, राजपुताना से आकर ये बनारस में रामानंद के शिष्य बन गए। कहा जाता है कि इन्होंने भगवान की मूर्ति को भोजन करवाया था

भक्ति आन्दोलन में दादूदयाल की भूमिका

हिन्दी के भक्तिकाल में ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रमुख सन्त कवि थे। दादू दयाल जन्म 1544 ई में अहमदाबाद में हुआ था। इनका संबंध धुनिया जाति से है। गृहस्थी त्यागकर इन्होंने 12 वर्षों तक कठिन तप किया।

दादू ने फ़तेहपुर सीकरी में अकबर से भेंट की थी और चालीस दिनों तक आध्यात्मिक विषयों की चर्चा भी करते रहे थे।इन्होंने निपख नामक आंदोलन की शुरूआत की। इन्होंने शबद और साखी लिखीं। इनकी रचना प्रेमभावपूर्ण है। इनके अधिकतर पद जात-पात के निराकरण, हिन्दू-मुसलमानों की एकता आदि विषयों पर हैं।

भक्ति आंदोलन और रविदास

संत रैदास जाति के चमार थे। लेकिन इनका धार्मिक जीवन जितना गूढ़ था, उतना ही उन्नत और पवित्र था। ये रामानंद के 12 शिष्यों में से एक थे।ये रामानन्द के अति प्रसिद्ध शिष्यों में से थे। ये जूता बनाकर जीविकोपार्जन करते थे। कबीर के समसामयिक कहे जाते हैं। मध्ययुगीन संतों में रैदास का महत्त्वपूर्ण स्थान है। मीराबाई ने इन्हें अपना गुरू माना है। इन्होंने रायदासी संप्रदाय की स्थापना की।

भक्ति आन्दोलन में निष्कर्षतः

भक्ति आंदोलन से हिन्दू-मुस्लिम सभ्यताओं का संपर्क हुआ और दोनों के दृष्टिकोण में परिवर्तन आया। भक्तिमार्गी संतों ने समता का प्रचार किया और सभी धर्मों के लोगों की आध्यात्मिक और नैतिक उन्नति के लिये प्रयास किये।

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